अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ द्वाबा में फूटा था जनसैलाब, तिरंगा फहराने की कोशिश में क्रांतिकारियों ने दी थी सर्वोच्च कुर्बानी
लालगंज (बलिया)। देश की आजादी के इतिहास में बलिया की धरती का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। यहां की मिट्टी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ऐसी जनक्रांति का इतिहास रचा, जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है। इसी गौरवशाली इतिहास का सबसे भावुक और प्रेरणादायी अध्याय है 18 अगस्त 1942 का बैरिया कांड, जब द्वाबा क्षेत्र के हजारों लोगों ने अंग्रेजी शासन को चुनौती देते हुए बैरिया थाने को घेर लिया था। थाने पर तिरंगा फहराने के प्रयास में पुलिस की गोलियों से अनेक क्रांतिकारी शहीद हुए और बैरिया का नाम स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया।
भारत छोड़ो आंदोलन की चिंगारी से धधक उठा था बलिया
अगस्त 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर देशभर में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। इसका प्रभाव बलिया में भी तेजी से दिखाई पड़ा। जिले के गांव-गांव में अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों में जबरदस्त आक्रोश था। बलिया के क्रांतिकारियों ने केवल आंदोलन में भाग लेने तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि अंग्रेजी प्रशासन की व्यवस्था को चुनौती देते हुए थानों,तहसीलों,रेलवे स्टेशनों और सरकारी प्रतिष्ठानों पर कब्जे का अभियान शुरू कर दिया। जिला प्रशासन के अनुसार अगस्त 1942 के दौरान बलिया में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध व्यापक जनविद्रोह हुआ और क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर उन पर अमानवीय अत्याचार भी किए गए। 16-17 अगस्त को बैरिया में बन गया था क्रांति का माहौल
16 और 17 अगस्त 1942 तक बैरिया क्षेत्र में क्रांति का वातावरण पूरी तरह तैयार हो चुका था। कमाडर भूपनारायण सिंह के नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोग बैरिया थाने की ओर बढ़े। भीड़ का दबाव देखकर तत्कालीन थानेदार काजिम हुसैन ने तिरंगा फहरा दिया और थाना खाली करने के लिए समय मांगा। लेकिन बाद में अंग्रेजी प्रशासन ने दोबारा थाने पर अपना नियंत्रण कायम करते हुए अंग्रेजी झंडा लगा दिया। इससे क्षेत्र के लोगों का आक्रोश और बढ़ गया।
18 अगस्त को थाने के सामने उमड़ पड़ा जनसैलाब…..
18 अगस्त की सुबह से ही बैरिया थाना क्षेत्र में लोगों का जुटना शुरू हो गया । किसान,मजदूर, छात्र,नौजवान, व्यापारी और आसपास के गांवों के लोग बड़ी संख्या में थाने की ओर पहुंचने लगे l
25 हजार से अधिक लोगों ने घेरा थाना……..
18 अगस्त की दोपहर तक 25 हजार से अधिक लोग बैरिया थाने के आसपास जुट गए। महिलाओं की अगुवाई धनेश्वरी देवी,तेतरी देवी और राम झरिया देवी कर रही थीं। वहीं भूपनारायण सिंह,सुदर्शन सिंह,परशुराम सिंह,बलदेव सिंह,हरदेव सिंह,राजकिशोर सिंह,बैजनाथ साह और राजकुमार मिश्र समेत कई क्रांतिकारी भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। भीड़ को देखते हुए थानेदार सिपाहियों के साथ थाने की छत पर पहुंच गया और मोर्चा संभाल लिया। इसी बीच कुछ क्रांतिकारी बगल से थाने में घुस गए और घोड़े को खोलकर अस्तबल को ध्वस्त कर दिया। देखते ही देखते भीड़ थाने के भीतर पहुंच गई। पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी, जिसके जवाब में क्रांतिकारियों ने पथराव किया।
कौशल सिंह ने छत पर पहुंचकर फहराया तिरंगा
इसी संघर्ष के बीच कौशल कुमार सिंह ने साहस का परिचय देते हुए छलांग लगाकर थाने की छत पर पहुंचकर अंग्रेजों का जैक उतार दिया और उसकी जगह तिरंगा फहरा दिया। इसी दौरान पुलिस की गोली लगने से वह शहीद हो गए। शाम तक चले संघर्ष में कुल 19 क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया l
ये क्रांतिकारी हुए शहीद……….
शहीद होने वालों में कौशल सिंह के अलावा गोन्हिया छपरा निवासी निर्भय कुमार सिंह, देवबसन कोइरी, विशुनपुरा निवासी नरसिंह राय,तिवारी के मिल्की निवासी रामजनम गोंड, मिल्की मठिया निवासी विद्यापति गोंड,चांदपुर निवासी रामप्रसाद उपाध्याय, टोलागुदरीराय निवासी मैनेजर सिंह, सोनबरसा निवासी रामदेव कुम्हार,बैरिया निवासी रामबृक्ष राय,रामनगीना सोनार,छठू कमकर,देवकी सोनार,शुभनथही निवासी धर्मदेव मिश्र,मुरारपट्टी निवासी श्रीराम तिवारी, बहुआरा निवासी मुक्तिनाथ तिवारी,श्रीपालपुर निवासी विक्रम सोनार, विक्की राम और भगवानपुर निवासी भीम अहीर शामिल थे। इसके अलावा दयाछपरा निवासी गदाधरनाथ पांडेय,मधुबनी निवासी गौरीशंकर राय और गंगापुर निवासी रामरेखा शर्मा समेत तीन क्रांतिकारी जेल की यातनाओं के दौरान शहीद हुए। अनेक क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने जेल की कालकोठरियों में डाल दिया, जिनमें कई के नाम तक इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हो सके।
बैरिया की यह शौर्यगाथा आज भी क्षेत्रवासियों को स्वतंत्रता संग्राम के उन वीरों के अदम्य साहस,संघर्ष और बलिदान की याद दिलाती है।
ऐतिहासिक विवरणों में इस भीड़ की संख्या हजारों से लेकर अंग्रेजी हुकूमत के प्रतीक यूनियन जैक को हटाकर थाने पर तिरंगा फहराना। थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों ने भीड़ को रोकने के लिए मोर्चा संभाल लिया। देखते ही देखते प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव बढ़ गया। भीड़ की ओर से पथराव हुआ और पुलिस ने जवाब में गोलियां चलानी शुरू कर दीं। गोलियों की तड़तड़ाहट से बैरिया का वातावरण दहल उठा, लेकिन क्रांतिकारियों के कदम पीछे नहीं हटे।
तिरंगे के लिए दे दी जान
अंग्रेजी शासन की गोलियों के सामने भी क्रांतिकारी थाने पर तिरंगा फहराने के अपने संकल्प से पीछे नहीं हटे। इसी संघर्ष में कई वीरों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में शहीदों की संख्या अलग-अलग मिलती है, लेकिन यह निर्विवाद है कि 18 अगस्त 1942 को बैरिया थाने पर तिरंगा फहराने के संघर्ष में बड़ी संख्या में द्वाबा के वीर शहीद हुए। कुछ स्रोत 18, जबकि अन्य 19 क्रांतिकारियों के शहीद होने का उल्लेख करते हैं।
इन अमर बलिदानियों में निर्भय कुमार सिंह,देवबसन कोइरी,नरसिंह राय,रामजनम गोंड, रामप्रसाद उपाध्याय, मैनेजर सिंह,रामदेव कुम्हार, रामबृक्ष राय,रामनगीना सोनार,छठू कमकर, देवकी सोनार,धर्मदेव मिश्र, श्रीराम तिवारी,मुक्तिनाथ तिवारी, विक्रम सोनार और भीम अहीर सहित अनेक क्रांतिकारियों के नाम इतिहास में दर्ज हैं। वहीं गदाधर नाथ पांडेय, गौरीशंकर राय और रामरेखा शर्मा सहित तीन अन्य क्रांतिकारियों की जेल यातना के दौरान मृत्यु होने का उल्लेख भी मिलता है।
शहादत के बाद भी नहीं टूटा हौसला बैरिया में हुई गोलीबारी ने क्रांतिकारियों के हौसले को तोड़ने के बजाय आंदोलन को और तेज कर दिया। बैरिया के बाद बलिया जिले के दूसरे हिस्सों में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनआंदोलन तेज हुआ। रेलवे स्टेशनों, पटरियों और सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया तथा कई स्थानों पर जनता ने अंग्रेजी प्रशासन को चुनौती दी।
शहीदों की स्मृति मे बैरिया में स्थापित शहीद स्मारक आज भी उस ऐतिहासिक संघर्ष की गवाही देता है। प्रत्येक वर्ष 18 अगस्त को यहां शहीद दिवस मनाया जाता है। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजनों, प्रशासनिक अधिकारियों, छात्र-छात्राओं और आम नागरिकों की ओर से शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
बैरिया की 18 अगस्त की क्रांति केवल एक थाने पर तिरंगा फहराने की घटना नहीं थी, बल्कि यह उस दौर की जनशक्ति का प्रतीक थी, जब आम किसान, मजदूर, छात्र और नौजवान अंग्रेजी साम्राज्य के सामने बिना हथियारों के भी सीना तानकर खड़े हो गए थे। इन अमर शहीदों की कुर्बानी ने द्वाबा की धरती को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में विशिष्ट पहचान दिलाई।
आज जब 18 अगस्त का दिन आता है, तो बैरिया का शहीद स्मारक नई पीढ़ी को यही संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल हासिल नहीं की गई थी, बल्कि इसके लिए अनगिनत लोगों ने अपना वर्तमान और भविष्य देश के नाम कर दिया था।


