सरकार विकास का ढिंढोरा पीट रही,लेकिन परिवार का भरण-पोषण करने वाले कर्मी वेतन के लिए मोहताज
लालगंज(बलिया) । डबल इंजन की सरकार में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन गांवों में मनरेगा योजना को धरातल पर उतारने वाले कर्मचारियों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। बलिया जिले की 940 ग्राम पंचायतों में मनरेगा योजना के तहत कार्य करने वाले कर्मचारियों को पिछले पांच माह से वेतन नहीं मिला है। नतीजा यह रहा कि दीपावली जैसे बड़े त्योहार पर भी इन कर्मचारियों और उनके परिवारों की खुशियां फीकी पड़ गईं। जहां अन्य विभागों के कर्मचारियों को वेतन के साथ बोनस भी मिला, वहीं मनरेगा कर्मियों के घर आर्थिक तंगी के चलते दीपावली पर खुशियों के दीपक तक नहीं जल सके।
विडंबना यह है कि गांवों में रोजगार सृजन से लेकर सरकारी योजनाओं को सफल बनाने तक की जिम्मेदारी निभाने वाले ये कर्मचारी खुद अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए परेशान हैं। करीब दो दशक से विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे कई कर्मचारियों के सामने आज भी नियमित वेतन की अनिश्चितता बनी हुई है। पांच महीने से मेहनत का पारिश्रमिक नहीं मिलने के कारण बच्चों की पढ़ाई, घर का राशन, दवाइयां और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है।
कर्मचारियों की पीड़ा इस बात को लेकर और बढ़ जाती है कि न तो उन्हें केंद्र सरकार का नियमित कर्मचारी माना जाता है और न ही राज्य सरकार की ओर से उन्हें ऐसी आर्थिक सुरक्षा मिल पा रही है, जिससे संकट के समय परिवार का भरण-पोषण हो सके। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इन कर्मचारियों की सुध लेने वाला कौन है? वर्षों तक सरकारी योजनाओं का बोझ उठाने वाले इन कर्मियों और उनके परिवारों की जिम्मेदारी किसकी है?
एक तरफ सरकार विकास और सुशासन की उपलब्धियां गिना रही है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण विकास की महत्वपूर्ण योजना से जुड़े कर्मचारी महीनों से अपने ही वेतन के इंतजार में बैठे हैं। दीपावली पर जब हर घर में रोशनी थी, तब इन कर्मचारियों के घरों में आर्थिक मजबूरी और मायूसी का अंधेरा छाया रहा।
अब मनरेगा कर्मियों को सरकार और विभागीय अधिकारियों से उम्मीद है कि उनके बकाया वेतन का शीघ्र भुगतान कराया जाएगा, ताकि उन्हें और उनके परिवारों को इस आर्थिक संकट से राहत मिल सके।


